Saturday, May 7, 2011

रफ़्तार ही पहचान है

फूल गिर जायेंगे सब पत्ते जुदा हो जायेंगे  
जब खिज़ायें आएँगी तो पेड़ क्या हो जायेंगे  

इस मशीनी दौर में रफ़्तार ही पहचान है  
धीरे धीरे जो चलेंगे गुमशुदा हो जायेंगे  

चंद बादल क्या हुए इतना अँधेरा हो गया 
इस कदर बढ़ते धुएं में शहर क्या हो जायेंगे 

अब किसी मरहम का होता ही नहीं इन पर असर 
एक दिन ये ज़ख्म सारे ला दावा हो जायेंगे 

कुछ हकीक़त और भी परदे के पीछे है 'मिज़ाज'
मैं बता दूंगा तो सब के सब खफा हो जायेंगे

मातृ दिवस पर मेरी और से मेरी चार पंक्तियाँ

शाद आबाद अगर हूँ तो बदौलत उसकी
माँ ने मेरे लिए हर वक़्त दुआएं की हैं

तुने माँओं की दुआएं तो सुनी हैं मौला
आज माँ के लिए बेटे ने दुआएं  की हैं

- अशोक  मिज़ाज

Wednesday, March 9, 2011

कहाँ से आयी ?

ये नई   बात   मेरे मन   में कहाँ से आयी
तेरी धड़कन मेरी धड़कन में कहाँ से आयी

दिल की दीवारें तो पत्थर की बना ली मैंने
सोचता हूँ ये  ग़ज़ल मन में  कहाँ से आयी

मैं उजालों में ही दिन रात  रहा करता था
ये ये सियाही मेरे दरपन में कहाँ से आयी

अब तो वो फूल निगाहों से भी ओझल हैं 'मिज़ाज'
ये   महक   रात  को   आँगन   में   कहाँ   से   आयी

Tuesday, February 1, 2011

हवा में शामिल है

नज़र से दूर है लेकिन फ़िज़ा में शामिल है
उसी के प्यार की ख़ुशबू हवा में शामिल है

मैं चाह कर भी तेरे पास नहीं सकता
कि दूर रहना भी मेरी वफ़ा में शामिल है

ख़ज़ाने ग़म के मेरे दिल में दफ़्न हैं यारों
ये मुस्कुराना तो मेरी अदा में शामिल है

ख़ुदा करे के ये उसको कभी पता चले
कि बेबसी भी हमारी रज़ा में शामिल है

तेरे सुलूक ने जीना सिखा दिया लेकिन
तेरे बग़ैर ये जीना सज़ा में शामिल है

Saturday, October 2, 2010

ग़ज़ल

मेरी दीवानगी, मेरी ये वहशत कम न हो जाए
तुझे छूने, तुझे पाने की चाहत कम न हो जाए

झपक जाएँ न पलकें आपका दीदार करने में
मिली है जो नसीबों से वो मुहलत कम न हो जाए

मैं तुझ से प्यार का इज़हार करने में झिझकता हूँ
बनी है जो तेरे दिल में वो इज्ज़त कम न हो जाए

'मिज़ाज' अपने अजीजों से भी मिलना दूरियां रखकर
ज़ियादा मिलने जुलने से मुहब्बत कम न हो जाए

दिल की परिभाषा

गुजरी हुई बहार की परछाइयों का घर
आबादियों के बीच है तन्हाइयों का घर
अच्छे बुरे में जंग सी होती है हर घड़ी
दिल है अलग मिज़ाज के दो भाइयों का घर

Tuesday, September 28, 2010