Sunday, August 21, 2011

पत्थर चटक गया


इक तीर एक पक्षी के दिल में अटक गया
निकली जो मुंह से आह तो पत्थर चटक गया

कहते हैं ये ग़ज़ल है उसी दर्द की कराह
जंगल की झाड़ियों में हिरन जब अटक गया

दुनिया में सबसे ऊँचा है लफ़्ज़ों का ये पहाड़
कोशिश हज़ार करके कलमकार थक गया

कोशिश भी तोड़ने की बहुत की गयी 'मिज़ाज'
लेकिन ये क्या कि शीशे से शीशा चिपक गया

नफ़रतों पे वार करना है


ज़िन्दगी वीरान है गुलज़ार करना है
उम्र भर इक बेवफ़ा से प्यार करना है

काग़ज़ों के भी कलेजे फट गए आख़िर
अब कलम में और कितनी धार करना है

ये ग़ज़ल इक लम्बी दूरी की मिसाइल है
इसका मकसद  नफ़रतों पे वार करना है

एक दुल्हन जिस तरह सजती सँवरती है
हर ग़ज़ल का इस तरह श्रृंगार करना है

इस नगर के आदमी भी पत्थरों से हैं
और हमें ज़ज्बात का इज़हार करना है

हमें इंसाफ़ चाहिये


जिसने सुना वो सुन के यकायक सिहर गया
इक रात में ही शहर ये लाशों से भर गया

पत्ते बिखर रहे हैं अभी तक जगह-जगह
उस सरफ़िरी हवा का जहाँ तक असर गया

कुछ लोग कह रहे हैं कि मुंसिफ का था कुसूर
मुजरिम हिला के हाथ सरे आम घर गया

इस हादसे का अस्ल गुनहगार कौन है
ये बात सोचने में ज़माना गुजर गया

मुजरिम कहीं भी हो हमें इंसाफ़ चाहिए
इक बार फिर ये आसमाँ नारों से भर गया

रफ़्तार ही पहचान है


फूल गिर जायेंगे सब पत्ते जुदा हो जायेंगे  
जब खिज़ायें आएँगी तो पेड़ क्या हो जायेंगे  

इस मशीनी दौर में रफ़्तार ही पहचान है  
धीरे धीरे जो चलेंगे गुमशुदा हो जायेंगे  

चंद बादल क्या हुए इतना अँधेरा हो गया 
इस कदर बढ़ते धुएं में शहर क्या हो जायेंगे 

अब किसी मरहम का होता ही नहीं इन पर असर 
एक दिन ये ज़ख्म सारे लादवा हो जायेंगे 

कुछ हकीक़त और भी परदे के पीछे है 'मिज़ाज'
मैं बता दूंगा तो सब के सब खफा हो जायेंगे