Tuesday, February 1, 2011

हवा में शामिल है

नज़र से दूर है लेकिन फ़िज़ा में शामिल है
उसी के प्यार की ख़ुशबू हवा में शामिल है

मैं चाह कर भी तेरे पास नहीं सकता
कि दूर रहना भी मेरी वफ़ा में शामिल है

ख़ज़ाने ग़म के मेरे दिल में दफ़्न हैं यारों
ये मुस्कुराना तो मेरी अदा में शामिल है

ख़ुदा करे के ये उसको कभी पता चले
कि बेबसी भी हमारी रज़ा में शामिल है

तेरे सुलूक ने जीना सिखा दिया लेकिन
तेरे बग़ैर ये जीना सज़ा में शामिल है

Saturday, October 2, 2010

ग़ज़ल

मेरी दीवानगी, मेरी ये वहशत कम न हो जाए
तुझे छूने, तुझे पाने की चाहत कम न हो जाए

झपक जाएँ न पलकें आपका दीदार करने में
मिली है जो नसीबों से वो मुहलत कम न हो जाए

मैं तुझ से प्यार का इज़हार करने में झिझकता हूँ
बनी है जो तेरे दिल में वो इज्ज़त कम न हो जाए

'मिज़ाज' अपने अजीजों से भी मिलना दूरियां रखकर
ज़ियादा मिलने जुलने से मुहब्बत कम न हो जाए

दिल की परिभाषा

गुजरी हुई बहार की परछाइयों का घर
आबादियों के बीच है तन्हाइयों का घर
अच्छे बुरे में जंग सी होती है हर घड़ी
दिल है अलग मिज़ाज के दो भाइयों का घर

Tuesday, September 28, 2010

Monday, August 2, 2010

स्वतंत्रता दिवस पर एकता का गीत

एकता ही जिस्म है और एकता ही जान है
हम सभी साँसें इसकी ये अपना हिन्दुस्तान है
अपना हिन्दुस्तान है ये अपना हिन्दुस्तान.....
एकता ने मिलके आज़ादी दिलाई है यहाँ
एकता ने मिलकर सब खुशियाँ मनाई हैं यहाँ
एकता के दम से अपने देश का सम्मान है
अपना हिन्दुस्तान है ये अपना हिन्दुस्तान.....
जीतना प्यारा ये वतन है उतनी प्यारी एकता
मिट न पायेगी किसी सूरत में हमारी एकता
एकता ही शान अपनी एकता ही आन है
अपना हिन्दुस्तान है ये अपना हिन्दुस्तान.....
अनगिनत मस्जिद यहाँ पर अनगिनत मंदिर यहाँ
कितने गुरूद्वारे यहाँ पर कितने गिरजाघर यहाँ
हैं बहुत से धर्म लेकिन एकता का मान है
अपना हिन्दुस्तान है ये अपना हिन्दुस्तान.....

यह गीत 'वन्देमातरम' नामक विडियो एल्बम में गुरप्रीत कौर द्वारा गाया गया है यह विडियो एल्बम father पॉल पल्लिपदान के सौजन्य से नवतरंग communications dwara fransis डेविड के संगीत एवं mathew clayton के संगीत संयोजन में स्वर दर्पण जबलपुर से रिकॉर्ड किया गया जिसे you tube पर  देखा जा सकता है.
Aapka-
              Ashok Mizaj 

Wednesday, July 21, 2010

Kargil shaheedon ke naam 26 july- Kargil Shaheed Divas

यह ग़ज़ल मैने उस वक़्त कही थी जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता चल रही थी कि अचानक कारगिल पर एक अघोषित युद्ध शुरू हो गया था वही ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है


इतिहास लिख रहा है, वही फिर नया ज़माना
मेरे सब्र की कहानी, तेरे ज़ुल्म का फ़साना

कभी फिर न सर उठाए, इसे वो सबक़ सिखाना
जो दगा दे दोस्ती में, उसे क्या गले लगाना

ये हवा का रूख़ अनोखा, जो सभी ने आज देखा
है इधर से दोस्ताना, है उधर से कातिलाना

कहीं जंग से किसी का, कभी कुछ भला हुआ है
कि लहू तो फिर लहू है, इसे यूँ न तुम बहाना

जो वतन पे मिट रहे हैं, कोई जा के उन से कह दे
ये पयाम शायराना, ये सलाम शायरना

Aapka-
              Ashok Mizaj 

Sunday, June 20, 2010

हमें इंसाफ़ चाहिये (a ghazal on Bhopal Gas tragedy)

 हमें इंसाफ़ चाहिये  (a ghazal on Bhopal Gas tragedy)

जिसने सुना वो सुन के यकायक सिहर गया
इक रात में ही शहर ये लाशों से भर गया


पत्ते बिखर रहे हैं अभी तक जगह-जगह
उस सरफ़िरी हवा का जहाँ तक असर गया

कुछ लोग कह रहे हैं कि मुंसिफ का था कुसूर
मुजरिम हिला के हाथ सरे आम घर गया

इस हादसे का अस्ल गुनहगार कौन है
ये बात सोचने में ज़माना गुजर गया

मुजरिम कहीं भी हो हमें इंसाफ़ चाहिए
इक बार फिर ये आसमाँ नारों से भर गया

Aapka-
              Ashok Mizaj