Sunday, August 21, 2011

चिंगारियां निकलती हैं


मुहब्बतों में भी दुश्वारियां निकलती हैं
वफ़ा के नाम पे लाचारियाँ निकलती हैं

हमारे दिल का हर इक ज़ख्म भर गया लेकिन
कुरेदा जाये तो पिचकारियाँ निकलती हैं

हमारी राह तो कच्ची सड़क है बारिश की
किनारा काट के सब लारियाँ निकलती हैं

मेरा मिज़ाज भी पत्थर सा हो गया है 'मिज़ाज'
जो चोट खाऊं तो चिंगारियां निकलती हैं

नया कह सकें जिसे


इक्कीसवीं सदी की अदा कह सकें जिसे
ऐसा भी कुछ लिखो कि नया कह सकें जिसे

आधी सदी के बाद ग़रीबों को क्या मिला
आज़दिये-वतन का सिला कह सकें जिसे

घुलने लगा है ज़हरे-सियासत फ़ज़ाओं में
अब वो हवा नहीं है, हवा कह सकें जिसे

हमने वतन के साथ बड़ी बेवफ़ाई की
तुमने भी क्या किया कि वफ़ा कह सकें जिसे

नया इन्क़िलाब माँगा है


किसी सवाल का तुमसे जवाब माँगा है?
कभी वफाओं का हमने हिसाब माँगा है?

मैं अपने चाँद के नखरे उठा के हार गया
ख़ुदा से मैंने अब इक आफ़ताब माँगा है

गरज रहे थे जो बादल वो हो गए ख़ामोश
सुलगती रेत के दरिया ने आब माँगा है

हम अपने जकड़े हुए ज़ह्नों को करें आज़ाद
वतन ने आज नया इंक़िलाब माँगा है

मेहरबानी चाहिए


एक राजा चाहिए और एक रानी चाहिए
कहने सुनने के लिए कोई कहानी चाहिए

खींच  कर नदियों का पानी सब समंदर पी गए
चीखती है प्यास हर सू हम को पानी चाहिये

हो गए काग़ज़ के टुकड़े फूल भी मुरझा गए
जिसको सदियाँ याद रक्खें वो निशानी चाहिए

आदमी को आदमी जैसा बनाने के लिए
इस ज़मीं को फिर फ़रिश्ता आसमानी चाहिए

इश्क में काफ़ी नहीं है आशिक़ी का ये हुनर
इसमें थोड़ी हुस्न की भी मेहरबानी चाहिए

मीरो-ग़ालिब , ज़ोको-मोमिन, फैज़ो नासिख़ या फ़िराक़
इनको पढ़ने के लिए उर्दू भी आनी चाहिए

इसलिए मुझको ग़ज़ल से प्यार है कि सुन 'मिज़ाज'
दिल लगाने के लिए सूरत सुहानी चाहिए