Sunday, August 21, 2011

नया इन्क़िलाब माँगा है


किसी सवाल का तुमसे जवाब माँगा है?
कभी वफाओं का हमने हिसाब माँगा है?

मैं अपने चाँद के नखरे उठा के हार गया
ख़ुदा से मैंने अब इक आफ़ताब माँगा है

गरज रहे थे जो बादल वो हो गए ख़ामोश
सुलगती रेत के दरिया ने आब माँगा है

हम अपने जकड़े हुए ज़ह्नों को करें आज़ाद
वतन ने आज नया इंक़िलाब माँगा है

मेहरबानी चाहिए


एक राजा चाहिए और एक रानी चाहिए
कहने सुनने के लिए कोई कहानी चाहिए

खींच  कर नदियों का पानी सब समंदर पी गए
चीखती है प्यास हर सू हम को पानी चाहिये

हो गए काग़ज़ के टुकड़े फूल भी मुरझा गए
जिसको सदियाँ याद रक्खें वो निशानी चाहिए

आदमी को आदमी जैसा बनाने के लिए
इस ज़मीं को फिर फ़रिश्ता आसमानी चाहिए

इश्क में काफ़ी नहीं है आशिक़ी का ये हुनर
इसमें थोड़ी हुस्न की भी मेहरबानी चाहिए

मीरो-ग़ालिब , ज़ोको-मोमिन, फैज़ो नासिख़ या फ़िराक़
इनको पढ़ने के लिए उर्दू भी आनी चाहिए

इसलिए मुझको ग़ज़ल से प्यार है कि सुन 'मिज़ाज'
दिल लगाने के लिए सूरत सुहानी चाहिए

हवा में शामिल है


नज़र से दूर है लेकिन फ़िज़ा में शामिल है
उसी के प्यार की ख़ुशबू हवा में शामिल है

मैं चाह कर भी तेरे पास आ नहीं सकता
कि दूर रहना भी मेरी वफ़ा में शामिल है

ख़ज़ाने ग़म के मेरे दिल में दफ़्न हैं यारो
ये मुस्कुराना तो मेरी अदा में शामिल है

ख़ुदा करे कि ये उसको कभी पता न चले
कि बेबसी भी हमारी रज़ा में शामिल है

तेरे सुलूक ने जीना सिखा दिया लेकिन
तेरे बग़ैर ये जीना सज़ा में शामिल है