Sunday, June 20, 2010

हमें इंसाफ़ चाहिये (a ghazal on Bhopal Gas tragedy)

 हमें इंसाफ़ चाहिये  (a ghazal on Bhopal Gas tragedy)

जिसने सुना वो सुन के यकायक सिहर गया
इक रात में ही शहर ये लाशों से भर गया


पत्ते बिखर रहे हैं अभी तक जगह-जगह
उस सरफ़िरी हवा का जहाँ तक असर गया

कुछ लोग कह रहे हैं कि मुंसिफ का था कुसूर
मुजरिम हिला के हाथ सरे आम घर गया

इस हादसे का अस्ल गुनहगार कौन है
ये बात सोचने में ज़माना गुजर गया

मुजरिम कहीं भी हो हमें इंसाफ़ चाहिए
इक बार फिर ये आसमाँ नारों से भर गया

Aapka-
              Ashok Mizaj 

Saturday, June 19, 2010

स्व. चंद्रभान बरहमन को समर्पित ग़ज़ल

मेरे वनवास में सब ठीक है बस एक अड़चन है
न कश्ती है, न केवट है, न सीता है, न लछमन है

उदासी छाई रहती है तो पतझड़ जैसा लगता है
बरस जाती हैं जब आँखें तो लगता है कि सावन है

ज़माने से शिकायत कुछ नहीं है सिर्फ़ इतना है
अभी कुछ रोज़ से मेरी ख़ुद अपने दिल से अनबन है

हमारी शायरी भी नौकरी के साथ चलती है
कभी खटपट नहीं करती, ये कितनी अच्छी सौतन है

न जाने आज क्या एलान कर डाला है साकी ने
जानबे शैख़ हैरत में हैं, सकते में बिरहमन है

न हिन्दी है, न उर्दू है, न अरबी फ़ारसी लाज़िम
जो दिल की बात पहुँचाए, दिलों तक शायरी फ़न है

'मिज़ाज' अच्छी ग़ज़ल को देखकर महसूस होता है
जलाई थी जो खुसरो ने वो शम्मा अब भी रोशन है
स्व. चंद्रभान बरहमन को समर्पित ग़ज़ल


( यहाँ शम्मा हिंदी बोल चाल में प्रचलित उच्चारण से लिया गया है )
Aapka-
              Ashok Mizaj 

Saturday, June 5, 2010

एकता के नाम

ये आँखों में नहीं रुकते, बहुत हैं सरफिरे आँसू
कि ग़म में भी गिरे आँसू ख़ुशी में भी गिरे आँसू
लहू का रंग गाड़ा और हल्का हो भी सकता है
मगर ये एक जैसे हैं तेरे आँसू मेरे आँसू
Aapka-

              Ashok Mizaj 

Thursday, June 3, 2010

अखबार की तरह

हर चीज़ तौलते हैं वो बाज़ार की तरह
उनकी दुआ सलाम है व्यापार की तरह

मुद्दे की बात पहले जहाँ थी वहीं रही
आए भी वो गये भी वो अखबार की तरह

ख़ुशियाँ हमें तो सिर्फ ख़्याली पुलाव हैं
मुफ़लिस के घर में ईद के त्योहार की तरह

यूँ सरसरी निगाह से देखा न कीजिये 
पढ़िए न मुझको मांग के अखबार की तरह
चट्टान बन के सामने आए थे जो कभी
गिरने लगे वो रेत की दीवार की तरह
अपना गुरूर छोड़ के मिलते हैं जब 'मिज़ाज'
उनका वजूद लगता है गुलज़ार की तरह